नाइजीरिया में एक फर्टिलाइजर कंपनी का कार्यभार संभालते हुए कोई शख्स नियमित फोटोग्राफी करे, पेंटिंग करे, स्कैचिंग करे और फिर पता चले कि एक दिन 'आँखों देखी' जैसी सार्थक फिल्म का निर्माता भी बन गया, तो आश्चर्य होना स्वाभाविक है, लेकिन पेशे से कारोबारी मनीष मूंदड़ा का मन मूलत: रचनात्मक कार्यों में लगता है, और इसीलिए जब वह अपनी कविता की पुस्तक के साथ हाजिर हुए तो अधिक आश्चर्य नहीं हुआ,
मनीष सोशल मीडिया पर अपनी छोटी-छोटी कविताएं पोस्ट करते रहे हैं. लाइक-शेयर के तराजू में तौलें तो सोशल मीडिया के पाठकों को उनकी कविताएं पसंद भी आईं. लेकिन, पुस्तक 'कुछ अधूरी बातें मन की' के माध्यम से कविता के अखाड़े में कूदने का अर्थ है कि मनीष बतौर कवि भी परीक्षा देने को तैयार हैं.
कवि मनीष मूंदड़ा की कविताओं के केंद्र में मन, सपने और सफर है. ये कविताएं आत्मकथात्मक हैं, और इसलिए जिन कविताओं से पाठक जुड़ जाता है, वो सीधे मन को छूती हैं. मनीष की कविताएं उनके कई वर्षों का बहीखाता मालूम होती हैं, जिनमें संघर्ष की राह का दर्द है, घर छूटने की पीड़ा है, पहला प्यार है और उम्मीदें भीं. इन्हीं उम्मीदों का दामन थामकर मनीष 'सोच साथ की' में लिखते हैं-
बहुत हो चुका क़त्ल ए आम अब
आओ मिलकर लाखों को गिना जाए
खून का हिसाब लगाया जाए
कुछ तो काम साथ मिलके किया जाए
बहुत देर हो चुकी है अपने-अपने धर्मों का बचाव करते
अब इंसानियत आजमाई जाए
आओ मिलके इस धरती को बचाया जाए
कुछ तो काम साथ मिलके किया जाए
तुम्हारी तरफ का चांद
क्या मेरी तरफ़ के चांद से अलग है ?
चलो चांदनी रात में अलख जगाई जाए
कुछ तो काम साथ मिलके किया जाए !
दरअसल, हर कविता का अपना रंग होता है और इस मायने में मनीष की पुस्तक इंद्रधनुषी रंग लिए हुए है. कई रंगों की कविताएं हैं. मसलन 'मेरी हार' को लीजिए. वह लिखते हैं.
जिसे तुम हारना मान रहे हो
मेरे नजरिए से देख पाओ अगर तुम तो
उसे मानना कहते हैं
मैं हारा नहीं
मैंने मान लिया तुम मेरे हो नहीं सकते
हार मानने
और दिल को मना लेने में फ़र्क होता है
इसी तरह मनीष की एक कविता है 'मतलब'. इस कविता का एक छोटा हिस्सा देखिए.
रोशनी का असल मतलब
अब समझ में आ रहा है
जब, दिन बस ढलने को है
सपनों का असल मतलब
अब समझ आ रहा है
जब, सपने बस टूटने को हैं
समझने-समझाने में आख़िर इतनी देर क्यूं हो जाती है?
मनीष मूंदड़ा न तो पेशेवर कवि हैं, और ना उनका साहित्यिक हलकों में कोई दखल है. वह बिना इसकी परवाह किए कि कोई क्या कहेगा-लिखते हैं. और इस लेखन में कभी वो आध्यात्मिकता का स्पर्श करते हैं तो कभी ख़बरों से रुबरु होते हुए क्रोधित. मसलन पंजाब में ट्रेन हादसे के बाद उनकी लिखी कविता 'तमाशबीन' संवेदनहीन सिस्टम पर करारा प्रहार करती है. कविता लंबी है, जिसकी आखिरी पंक्तियां हैं-
आंसू बहेंगे
रोना पीटना भी होगा
भाषण होंगे
समाचारों में रोष भरे प्रदर्शन होंगे
फिर सब चुप
जो मरे
जिनके मरे
जो कटे
जिनके कटे
वो सरकार
वो समाचार
वो आक्रोश
वो आवाज़ें
वो चीख़-पुकार
सब चुप
सब शांत
लाखों की अगली खेप तक
मनीष के कविता संग्रह में 108 कविताएं हैं और इन कविताओं को पढ़कर एक बात साफ हो जाती है कि मनीष के भीतर एक संवेदनशील कवि भी बसता है. कड़वी हवा, जो बाकी है, जो होना था, वो हुआ ही नहीं, तुम, एक बात जैसी कई कविताएं बार-बार पाठकों को झकझोरते हुए कहती हैं कि मनीष का कवि मन बहुत कुछ कहना चाहता है, बहुत कुछ अच्छा करना चाहता है, बहुत कुछ बुरा बदलना चाहता है.
मनीष के कविता संग्रह की विशेष बात यह भी है कि अगर वह बतौर कवि संवेदनाओं की परतों को खोलते हैं तो अपनी भाषा से चौंकाते भी हैं. किताब की भूमिका में जाने माने कवि कुमार विश्वास ने लिखा भी है- 'जिस समय भाषाई शुद्दता को बचाने में इतनी कठिनाई हो रही है, ऐसे समय में पूर्णकालिक साहित्यकार न होने के बावजूद भाषा की यह साध दुर्लभ है.'
मनीष चित्रकार भी हैं तो कई कविताओं में दर्शक चित्र की अनुभूति कर सकते हैं. लेकिन तमाम विशेषताओं से अलग मनीष की कविताएं इसलिए भी ध्यान खींचती हैं कि वो भाव को दुश्कर नहीं बनाते. शब्दों का आंडबर नहीं रचते। वो दिल से दिल की बात करते हैं. मनीष किताब की शुरुआत में लेखकीय में कहते भी हैं- 'ये कविताएं मेरी और मेरे मन के बीच की बातें हैं.'
दिलचस्प यह कि मनीष ने जिस अंदाज में उनके और उनके मन के बीच की बातें लिखी हैं, वे कई बार पाठकों के मन से भी सीधे जुड़ती हैं. और फिर अचानक पाठकों का ध्यान इस कवि के निर्माता होते हुए उन फिल्मों की फेहरिस्त पर जाता है, जो कुछ सार्थक रचना-कहना चाहती हैं. मसलन- आँखों देखी, मसान, न्यूटन, धनक और कड़वी हवा.
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मौन मुखरित है मनीष मूंदड़ा के काव्य-संग्रह 'कुछ अधूरी बातें मन की' में