वानर! यह महज एक उपन्यास नहीं है बल्कि राजनीति, इतिहास, पौराणिकता और सामाजिकता का एक ऐसा चौराहा है जहां खड़े होकर आप अतीत की सुनहरी गलियों की तरफ जा सकते हैं, तो मानवता के लिए एक बेहतर और तार्किक भविष्य का रास्ता भी वहां से खुल सकता है, आनंद नीलकंठन का उपन्यास 'वानर' रामायण के एक अहम किरदार बालि, उसकी पत्नी तारा और भाई सुग्रीव की प्रेम कहानी के धागे से बुना गया है. इस उपन्यास में यह बखूबी बताया गया है कि मानव संवेदना की पराकाष्ठा कैसे प्यार में बदल जाती है. उस प्यार में इंसान हुकूमतों को ठोकर लगाता है, रिश्तों के ताने बाने से निकलने को तड़पता है और ना-ना करते भी वह सब करता है, जो उसके लिए काम्य नहीं होता.
बालि और सुग्रीव की कहानी दो भाइयों के अविश्वास की कहानी के रूप में अब तक सामने आती रही है. आनंद ने उसको मानवीय रिश्तों की भूलभुलैया में अटकी एक नई कहानी के रूप में पेश किया है. उनका उपन्यास वानर यह बताता है कि बालि और सुग्रीव की लड़ाई किष्किंधा के साम्राज्य के लिए नहीं था, बल्कि इससे आगे तारा के लिए था, तारा यानी बालि की पत्नी, जिससे सुग्रीव भी प्यार करता था, वह अपने भाई से तो कुछ कह नहीं पाता, जिसके संरक्षण, प्यार और स्नेह के साए में उसकी जिंदगी गुजरी. लेकिन तारा से उसने बार-बार अपना प्रणय निवेदन किया. नीलकंठन के उपन्यास वानर में प्रेम त्रिकोण की यह कहानी इतने दिलचस्प और घुमावदार मोड़ों से गुजरती है कि एक बार आप पढ़ने लगेंगे तो आपको लगेगा कि प्यार उतना भी स्याह सफेद नहीं होता जितना लोग समझते हैं.
आज हम 21वीं सदी के समृद्धशाली और सामर्थ्यवान भारत में रह रहे हैं, लेकिन जाति और धर्म के संकीर्ण दायरे से निकलने को हम तैयार नहीं हैं, रामायण के दौर में भी समाज देव, असुर और वानर में बंटा हुआ था, वानर उनको कहा गया जो वन के नर थे. जो जाति और वर्ण व्यवस्था में शुद्र गिने जाते थे. शुद्र क्या शुद्रों में भी अछूत माने जाते थे जिनको छूना तक वर्जित था. इस उपन्यास में वानरों के बहाने समाज के अंत्यज समुदाय के जीवन और परिवेश का बेहद मार्मिक चित्रण हुआ है. साथ ही समाज को देवताओं के नहीं बल्कि वानरों की दृष्टि से देखने की कोशिश हुई है. उपन्यासकार ने वानर जाति के माध्यम से यह भी बताने का प्रयास किया है कि जिनको हम हाशिए लायक भी नहीं मानते हैं, कैसे वे लोग एक बेहतर समाज बनाने और समतामूलक व्यवस्था के हामी बनते हैं. इस उपन्यास में एक जगह हनुमान कहते हैं कि देशभक्ति दूसरों से घृणा करना नहीं है. क्या हनुमान का यह नजरिया आज के नव देशभक्तों की देशविरोधी सोच पर बड़ा सवालिया निशान नहीं है?
आज नारी सशक्तिकरण की बात खूब होती है लेकिन उस दौर में महिलाओं की हालत न तो देवों और मनुजों के समाज में अच्छी थी, न ही असुरों के समाज में. उपन्यास में वानरों की महारानी तारा एक बड़ा महीन सवाल अपने आप से पूछती है? जब उसको पता चलता है कि लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी और बदले में रावण राम की पत्नी सीता का अपहरण करके ले गया तो तारा यही सोचती है कि यह कौन सा पुरुषार्थ है, जिसमें निजी शत्रुता की भेंट महिलाएं चढ़ती हैं? वह अपने वानर समाज की तरफ देखती है जहां महिलाओं की मर्यादा बड़ी होती है और उसके लिए बिना किसी छल-छद्म के आमने-सामने की लड़ाई लड़ी जाती है.
पेंग्विन प्रकाशन से प्रकाशित आनंद नीलकंठन का उपन्यास 'Vanara: The Legend of Baali, Sugreeva and Tara' सामाजिक राजनीतिक दर्शन के अलावा पढ़ने के लिहाज से इस दृष्टिकोण से भी बेहतर है कि इसका हर चैप्टर अरेबिनय नाइट्स की तरह एक रोमांचक मोड़ पर खत्म होता है और आपकी दिलचस्पी तुरंत अगले चैप्टर को पढ़ने में होगी. लेकिन पौराणिक गाथाओं की अपनी सीमाएं भी होती हैं और कई बार वो सीमाएं टूटती भी हैं. अहल्या का प्रसंग इस उपन्यास में आया है लेकिन रामायण में उसकी कहानी उत्तर भारत की तरफ है ना कि किष्किंधा या दक्षिण भारत के किसी छोर पर. दूसरी तरफ तारा को सुषेण की बेटी बताया गया है जो वानरों के बीच एक सामान्य वैद्य होता है. लेकिन रामायण में सुषेण तो लंका के राजा रावण का राजवैद्य होता है. लेकिन उपन्यासकार यदि देश-काल-परिस्थिति के मुताबिक लोक मान्यताओं में बदलाव ना करे तो कहानी के उबाऊ होने का खतरा होता है. आनंद ने अपने उपन्यास को कहीं भी बोझिल नहीं होने दिया है, और चाहे आप पौराणिक आख्यानों में रुचि रखते हों या नहीं, आपको यह उपन्यास पसंद अवश्य आएगा. आनंद की भाषा भी बेहद सहज और प्रवाहमय है.
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वानर: आनंद नीलकंठन का वह उपन्यास जिसमें धड़कता है हाशिए पर खड़े समाज का प्यार